अनुभव ही जीवन हे, जीवन को अनुभव से ही समझा जा सकता हे.
हम आज से अपनी यह लिखने की प्रवर्ती को रोज एक आदत के रूप मे स्वीकार करता हू, हम अपने चारो तरफ की दुनिया की देखते हे ओर शान्त भाव को रखकर केवल 3 महीने मे अपने भाग्य का रचैइता बन सकते हे, यह हमारा परम (अटल) विश्वास हे, एक दिन एसा अनुभव हुआ जो हमारे दिल को छू गया, नवरत्रो का समय चल रहा हे, ओर हमारे घर मे यह निर्णय नही हो पा रहा हे कि क्या हम नो कन्या पूजन करना हे या नही, हमारी माँ ने नवरात्र वर्त का अनुष्ठान किया हे उनका कहना हे की इस नवरात्रि हमे अपने देवी-देवतो का ध्यान करना चाहिये, इसलिए वह कन्या पूजन नही करेंगी, माता के पुत्र की पत्नी का यह मानना हे की नवरात्रि व्रत रखो तो कन्या पूजन या हो सके तो गाय माता को ही यथा उचित भोजन करवाया जाये, इसके बिना व्रत का उचित लाभ नही मिलता, ओर तो इसमे कोई खर्च भी नही आता, कन्या पूजन ओर गाय को भोजन करना या भूखे को भोजन ओर पानी की व्यवस्था करना बड़े ही भाग्यशाली, पुनेयशाली कार्य हे इस जीवन मे. माँ ओर बहू कि इच्छा अलग हे परंतु दोनो भला पूरे घर का चाहती थी, राम नवमी की सुबहा माँ ने देवताओ की पूजा प्रारम्भ की ओर पूजा समाप्त होने पर यग्य किया, हम सभी अपने कार्य से निवृत होकर अपने रोज मररा के कामकाज मे लग गये. तभी अचनाक कन्याओ को आना शुरू हो गया, हमारी माँ ने कहा भी कन्याओ से की हम कन्या पूजन नही कर रहे हे, बहू भी वाहा पर मोहजूद थी उसने भी कहा परंतु जेसे वह कर रही हो हम तो आपके यहाँ भोजन करके ही मानेंगी, कहाँ बहू के मॅन मे विचार आया की कन्या अपनी मर्ज़ी से आई हे तो उनका निरादर करना उचित नही इस भाव से भरकर उनके स्वागत भोजन एवम् सेवा की यथासंभव व्यवस्था करने को उद्घत हुई, उनके सेवा मे अपनी उसी अवस्था मे नो देविओ के आगमन को सफलता पूर्वक सम्पन किया, कन्याओ ने परिवार को बहुत से आशीर्वाद दिए मानो सबकी मनोकामना पूरी करने के लिए ही आई हे. सभी को वह दिन याद हे, उस सेवा के परम मोके से हम ओर हमारा विश्वास धान्ये हो गये.
बोलो जय माता दी जय माता दी जय माता दी, बोलो जय माता दी जय माता दी जय माता दी, बोलो जय माता दी जय माता दी जय माता दी,बोलो जय माता दी जय माता दी जय माता दी,बोलो जय माता दी जय माता दी जय माता दी,
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बहू का यह मानना हे कि जीवन का आनन्द सबके साथ मिलकर खाने खिलाने ओर मिलकर ट्रेरेवाल करने मे ही हे, सभी के साथ मिलकर ज़िमेदारियो को निभाना ही जीवन हे, यह कार्य जो अंतिम सांस तक निभानी ही पड़ती हे, अपने परिवार के साथ enjoy करने मे एक साथ मिलकर कर्म करने मे बड़ा ही मज़ा आता हे ओर अपनो की खुशी से बढ़कर क्या हे इस संसार मे, संसार तो मात्र एक स्वपन हे ओर हम सब जीवन जीते भी हे स्वपन मे, आप तो जानते ही हे हर वयक्ति अलग हे अपने आप मे, कोई भूतकाल के विषय मे ही डूबा रहता हे बाहर ही नही निकल पाता, हमेशा याद रखता हे तो कोई भविष्य का सपना देखता रहता हे ओर उमीद लगाये रखता हे अपने आने वाले कल पर, पर हम ये नही समझ पाते कि जब यह संसार ही स्वम मे एक सपना मात्र हे तो हम अपने स्वप्न मे अपने वर्तमान को ही क्यो नही देखते, अपने वर्तमान के प्रति साक्षी क्यो नही हो जाते, हमेशा अपने चेतना के साथ वर्तमान मे क्यो नही रहते, हम मनुष्य हे ओर हम ही यह जानते हे की सत्य यही हे जीवन का. हम अपने हर पल को देख सकते हे ओर हम ये कर सकते हे, इस संसार से जुड़े हमारे भावनात्मक संबंध ही हमे यहाँ से जाने नही देते, यह पूरा संसार ओर इस संसार से जुड़े हमारे रिस्ते ही हमारे सपने का मूल कारण हे ओर ये कारण इतने प्रभावशाली हे कि यह हमारे मन को अपने तरफ़ खिच लेती हे. ओर संसार का यह सपना हमे सत्य जान पड़ता हे, ये दुनिया विचारो की दुनिया हे ओर हर विचार अपने आप मे इतना शक्ति शाली होता हे की हर कोई इसमे उलझ जाता हे, वह अपनी पसंद ना पसंद. सुख-दुख, हानि-लाभ, पीड़ा जेसी भावनाओ मे पड़कर रिस्तो की मजबूरी मे फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हे, हक़ीकत यह हे की स्वपन मे किसी को कुछ नही होता हे ओर यदि इस डर से मनुष्य आगे बड़ गया तो वह स्वपन हमारी सफलता, दोलत, खुशी जेसे अदभुद अनुभव को पा सकते हे, जीवन का उद्देश्य यह हे की वह अपने अनुभव से आनंद प्राप्त करता रहे. प्रेम ओर समर्पण मे कोई ज़्यादा अंतर नही होता हे, दोनो लगभग एक जेसा हे जान पड़ता हे एक सा अनुभव होता हे, प्रेम मे हमे कुछ नही चाहिए होता ओर समर्पण मे हमे सब कुछ चाहिए जिसके सामने समर्पण किया जा सके. प्रेम के मस्त मोसम मे हम ओर परम उर्जा मिलन के लिए इतने उत्सुक होते हे ओर कुछ ही पलो मे यह महसूस होता हे की आनंद को नापने के लिए समय का कोई मापदंड नही होता हे. यही वो आनंद हे जो हमे वर्तमान से मिलता हे, प्रेम आंतरिक परवृति से आनंद को प्राप्त हे ओर समर्पण बाहरी परवृति से आनंद को प्राप्त हे, आनंद हमे प्रेम से सहज ही प्राप्त हो जाता हे क्योकि प्रेम मे समर्पण सहज ओर सरल होता हे, प्रेम मे व्यक्ति सदेव खुश होता हे, प्रेम हमे भोतिक, मानसिक, ओर शारीरक रूप मे प्राप्त होता ही रहता हे.
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उदाहरण के लिए आप एक रेस जीत ली हे जो लगभग 2000 मीटर की थी आप प्रथम आये हे, आपने इस खुशी को बाँट दिया इस संसार मे भोजन दान के रूप मे, कपड़ा आदि के रूप मे, ओर यह करने के बाद जो खुशी ओर शांति मिलती हे जिसे बताया नही जा सकता ओर इससे बढ़कर कुछ भी नही जान पड़ता, आप अपनी पत्नी से प्यार करते हे ओर जो खुशी मिलती हे यही वो खुशिया हे जो हर व्यक्ति को चाहिए, यह केंद्र बिंदु हे जीवन का, यह प्रवर्ती इस संसार मे आने ओर इसके साथ रहने का मूल हे, प्रकर्ती ने हमे सब कुछ पहले से ही दे रखा हे, सब कुछ नीवछावर कर दिया हे हमारे विकास के लिए ओर हम अपना विकास करने मे समर्थ भी हे, बाहर वही इस्थिति हे जो भीतर हे, अपने भीतर को बदलना आपके हाथ मे, बाहर को बदलना आपके हाथ मे नही हे, बाहर हमारे भीतर के बदलने का इंतजार करता हे, हम उसे बाहर से नही बदल सकते, इसे सिर्फ़ परम उर्जा ही CONTROL करती हे, अपने जगर्त स्वप्न के जागर्त अनुभव के पॅलो मे हमेशा स्वयं मे खुश रहना बड़ा ही सरल हे , आप एक द्रष्ता की तरह सब कुछ देखकर यह अनुभव कर सकते हो की इस की इस सबसे यह मेरे अंदर किस तरह के प्रतिक्रियाए हो रही हे, इसको बस इस प्रकार देखते रहना हे की भीतर ओर बाहर सब कुछ शांत हे ओर शांत होता चला जा रहा हे, ओर जेसे ही आप शांति की इस्थिति मे होते हे तब सब कुछ समझ मे आने लगता हे, जिस प्रकार हम सिनेमा घरो मे फिल्म देखने जाते हे ओर वहाँ के अंधेरे मे ओर ठंडे वातावरण मे बेट कर फिल्म देखने मे खो जाते हे जेसे हम हो ही ना वहाँ हम तो फिल्म बन जाते हे, यह ध्यान ही नही रहता की हम कहाँ हे, यही वो अवस्था हे जहा हम यह जान पाते हे की कोन देखता हे कोन देख रहा हे, वह अपने उद्देश्य को बड़ी ही आसानी से पा लेता हे, यदि कुछ विशेष करना ही हे तो अपने आप के लिए करना सीखो उस पर ध्यान लगाओ हर पल को इस तरह जियो की ध्यान अपने अंदर बनी शांति मे लगा रहे, चेतना शांत बनी रहे,ओर यदि शांति बनी रहती हे तो यही ज्ञान ओर ध्यान की अवस्था हे.
उस परम पवन विश्वास को मे शत शत नमन करता हू 🌄🌅🌄🌅🌄🌠🎇🎇
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