भारतीय संस्कार, संस्कृति, ज्ञान हर मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण नियम हे - जीवन दर्शन
आज की सोच का कोई आधार नहीं है ना ही कोई संतुलन, फिर भी हम हमारे स्वम के बारे में, अपने जीवन के परम लख्य - मानवता, दया इंसानियत प्रेम करुणा छमा को सिखने से चूक जाते हे और बस दुनिया के बारे में ही सोचते रहते हे और आदत के बात करे तो थकते भी नहीं इस सब से ऐसा मान लेते हे की भाई कुछ नहीं हो सकता. जीवन ही हमारा वर्तमान हे हमारी प्रतिक्रियाओ से जुड़ा हुआ हे और हमारी सोच दुसरो की सोच से जुडी होती हे फिर हम कामयाबी और उस परम लख्य के बारे में कैसे कदम से कदम मिला सकते हे, जिस इंसान को भारतीय संस्कार किसी भी कारन प्राप्त नहीं हो सके. क्यों की भारतीय संस्कार ही मानव को मानव से परिचित करवाता हे. मानव जीवन सबसे श्रेस्ठतम अवस्था हे जीने की इस परकीर्ति से, सारा विश्व जनता हे की ये सृष्टि एक ऊर्जा हे परन्तु वह क्या हे आज तक जान नहीं पाए, ये रास्ता भी नहीं हे वो रास्ता भारत में हे उसके छिपे ज्ञान में हे उसके विश्वाश में हे अन्धविश्वास और विज्ञानं में नहीं। एक आम इंसान अपने बारे में ये प्रश्न नहीं करता की उसे जीवन में क्या चाहिए जब तक उसके भविष्य पर निर्भर हे की क्या वह इस प्रश्न को ही जान सके वह आगे गति नहीं कर सकता।
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यह अहम् सवाल हे अपने आप से पूछिए की जो भी हे क्या वह काफी हे अभी के लिए उसे जीवन से कुछ और चाहिए क्या। आज की वर्त्तमान समय में टेक्नोलॉजी समय में, काम और पैसा हे सब कुछ हे। भारत एक आध्यात्मिक देश हे एक शान्ति प्रिये राष्ट्र हे, यहाँ की सभ्यता संस्कृति संस्कार बहुत प्राचीन हे, बहुत मजबूत हे, इस विश्व में भारत की सभ्यता, संस्कृति, संस्कार का जनम वेदो जी शीतल धारा और पुराणों की ठंडी छाया में हुआ हे और भारत देश विकास के नए चरणों को छूने में सफलता बढ़ रहा हे रोज उगते हुए सूरज की तरह. और उसी देश में रहकर हम भारतीय सारी उम्र अपनी ओर अपनों की इच्छा के पीछे भागते ही रहते हे. एक मानव के लिए जीवन के महान मूल्यों को समझने में सभ्यता संस्कृति संस्कार बहुत मदद देते हे. जब से जीवन का उदय हुआ हे प्रकृति का विस्तार प्रारम्भ हुआ हे तभी से यह मानवीय और आध्यात्मिकता का केंद बिंदु बना हुआ हे. वेद और पुराण हमारे जीवन का निर्माण करते हे इस आधुनिक युग में हमारी इस अधिकार का हनन हो रहा हे क्योकि किसी भी विद्यालय में वेदो और पुराणों को नहीं पढ़ाया जाता. आज की विज्ञानं की दुनिया ज्ञान की बातो को नहीं मानती।
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अनुभव ही जीवन हे, जीवन को अनुभव से ही समझा जा सकता हे
आज का समय एक आदत बन गया हे की हर किसी के इच्छा हे और पूरी नहीं होती परन्तु फिर भी इच्छा समाप्त नहीं होती और सबकी इच्छा पूरी करते करते समय कब गुजर जाता हे और पछताने के शिवा कुछ नहीं मिलता. हम अपने है सभ्यता संस्कृति संस्कार को जान ही नहीं पाते, जीवन का परम लख्य, उदेश्ये फिर सब बेकार हे और लगता भी हे क्योकि कितना भी इच्छा पूरी कर ले परतु हर इंसान के पास कोई न कोई समस्या जरूर हे, इसका मतलब वो जीवन का असली आनंद उठा नहीं पाया।
कविता का शीर्षक - आज की दौड़
भागते भागते हम, कहाँ जा रहे हे, जहाँ जा रहे हे, भागते जा रहे हे.भागते भागते ये, भूलते जा रहे हे, क्यों भागना हे, क्यों भागते जा रहे हे, सोचना हे खुद, को सोच भी ना पा रहे हे, भागते भागते, सोचते जा रहे हे, अँधेरी गलियों में, अँधेरे रास्तो पर, बिना किसी विचार के, भागते जा रहे हे.
अनजाने रास्ते हे, मंजिल कहाँ हैं, पता भी नहीं हे, खुद को पहचानना हे, औरपहचान भी न पा रहे हे, क्योकि आलम ये हे, बे परवाह भागते जा रहे हे,समय नहीं हे, परेशानी इतनी हे, दो घडी रूककर, सोच भी न पा रहे हे,अपनी मानसिकता को, क्यों भूलते जा रहे हे, भागना नहीं हे, फिर भी, भागते जा रहे हे.
जीवन को क्यों गवा रहे हे, अपने आप से पूछो, क्यो भागते जा रहे हे.
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( हमारी सोच हे हमारा वर्तमान और वर्तमान ही हमारा जीवन, वर्तमान को जीना सर्वश्रेष्ठ कला हे और जो इस कला को सीख कर माहिर हो जाता है, वही जीवन का असली मजा उठा पता है. )
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