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घोर कलयुग की दस्ता



घोर कलयुग की दस्ता



वेदो ओर पुराणो मे बताया गया हे, जब इंसान-इंसान को, इंसान ना समझेगा, अपने सिवा किसी को महत्व नही देगा , अपनी ओर अपनो की ही इक्च्छा पूर्ति के लिए वही मार्ग अपनाएगा जो उसके लिए उचित हो, अपनी आत्मा की तृप्ति करने के लिए  नीति न्याय ईमानदारी की सीमा का उल्लधन बिना किसी ड्ऱ के करेगा .


माता पिता अपने बेटे की बात से या बेटा मात पिता की बात से सहमत नही रहेगा, भाई बहन के रिश्ते मे दरार आ चुकी होगी, न्नंद -भाभी की आपस मे नही बनेगी, माता पिता अपनी वस्तुओ को अपने ही बच्चो से छिपाकर रखने लग जाएगे, बच्चे अपने मातपिता की सहीआदत नही सीकेगे, माता पिता भी सही मार्ग नही सीखना भूल जाएगे बच्चो को,दुनिया से परिचित करवाने मे डरेगे, अपने ही बच्चो मे भेदभाव करने लगेगे. किसी की कम ओर किसी को ज़्यादा मान देगे. इंसान इंसान को नही पेसे को ज़्यादा महत्व देने लगेगा.

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लोग भौतिक ओर मानसिक तरह से, लोगो का बुरा ही सोचेगे, कोई किसी की मदद नही करेगा ओर ना ही करने देगा, बुरे लोगो की सुख ओर वेभव की प्राप्ति होगी ओर आच्छे वयक्ति को मिलेगी ज़मीन मे क्र्ब, इंसान का कद उसकी सोच पर निर्भर करेगा. जिस व्यक्ति की सोच सही होगी वह ही परभु के दर्शन कर सकेगा ओर जिसकी सोच गंदी होगी वह तड़प कर मार जाएगा. जेसे बिन पानी के मछली तड़प कर मार जाती हे. इंसान की सोच जानवर जेसी ओर उसकी हरकत एक दम लालची बानिए के जेसे हो जाएगी, समझ लेना दोस्तो घोर कलयुग चल रहा हे.

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