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The Women Tells Her Own Story (स्त्री अपनी कहानी स्वयं ही कहती है).

स्त्री की कहानी, स्त्री की जुबानी |

जीवन की शुरुआत ही स्त्री से होती है, स्त्री ना हो तो इस जीवन की शुरुआत होना असंभव सा जान पड़ता है | यह प्रकृति, Nature नेचर, भी एक स्त्री है, यह हमारी सभी जरूरतों को समय समय पर पूर्ण करती रहती है परंतु अपनी जरूरतों के बारे में किसी से कुछ नहीं कहती, इसी प्रकार का स्वभाव नारी का भी है, स्त्री सभी के लिए कुछ न कुछ करती ही रहती है परंतु उसके बारे में कोई कुछ नहीं करता और वह फिर भी खुश है | स्त्री के साथ तो बहुत जन्मों से अन्याय ही होता चला आ रहा है. आप सभी तो जानते ही हैं कि स्त्री का कोई महत्व ही नहीं था पहले की कोई युगों में | स्त्री अपनी कहानी स्वयं कहती है, यह प्रकृति मां भी अपनी कहानी स्वयं ही कहती है, स्त्री (प्रकृति) कहती है, जबसे मेरा जन्म हुआ है, इस दुनिया में, तब से लेकर आज तक, सभी मेरा उपयोग ही करते आए हैं, कभी किसी ने मुझे बचाने, संरक्षण करने, का कोई भी कर्तव्य निभाने में पहल नहीं की |

आज दुनिया जिस प्रकार की दिखाई देती है यह सब कर्मों का फल है इस प्रकृति का | स्त्री कौन है | स्त्री के अनेकों नाम है. स्त्री घर की लक्ष्मी, कुंवारी, कन्या, औरत, बेटी, बहन, मां और पत्नी | जिस प्रकार स्त्री के अनेक नाम होते हैं उसी प्रकार उसके अनेकों गुण भी होते हैं, अनेकों विशेषताएं भी होती हैं. उसी प्रकार उसके अनेकों सवाल भी होते हैं, अनेकों स्वभाव भी होते हैं | जब जन्म होता है एक बेटी का, तो उसे बहुत ही प्रेम मिलता है, उसका सभी बहुत ही अच्छे से ध्यान रखते हैं उसकी हर एक जरूरत के बारे में ध्यान रखा जाता है और उसके लिए क्या उचित है, आगे, उसके ऊपर भी काम किया जाता है, बहुत सारा प्यार दिया जाता है.

एक बहन होने के कर्तव्य में, एक औरत, एक स्त्री, बहुत सारा प्रेम अपने और अपने घरवालों पर लुटा देती है, उनका बहुत देखभाल करती है और बहुत ही सेवा भाव करती है. स्त्री के मां के स्वरूप के बारे में तो हम सभी बहुत अच्छी तरह से परिचित हैं, उसकी तो कहीं पर भी महिमा खत्म ही नहीं होती, वह अनेकों तरह की विशेषताओं और विचित्र महिमा से भरी पड़ी है. स्त्री अपने और अपने परिवार के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहती है, बिना किसी स्वार्थ के | वही स्त्री के पत्नी रूप की तो महिमा ही निराली है. वह बहुत ही अलग छवि प्रदान करती है, एक अलग स्वभाव को दर्शाती है, वह अपने सभी कर्तव्यों की पूर्ति के लिए अपने पति की इच्छा पर निर्भर करती है और अपने पति की बात ही सुनती है और उसी की बात मानती है यह बहुत ही विचित्र बात है | स्त्री की अपनी स्वतंत्रता बहुत ही कम मायने में, लोगों को दिखाई देती है, स्त्री स्वयं भी अपनी पूर्ण स्वतंत्रता के बारे में कभी नहीं पूछा कि वह सदैव और पूरे जीवन सिर्फ और सिर्फ अपने और अपनों के बारे में सोच कर, उनके लिए, उनके जीवन का मार्गदर्शन करते हुए ही बताती है |

माना जाता है कि स्त्री में सभी देवियों के गुण मौजूद हैं, विद्यमान हैं, जिस देवी का गुण, जिस स्त्री में प्रधान होता है, वही स्त्री का स्वरूप हो जाता है | स्त्री, नदी के वेग के समान होती है, जब समान धारा में बहती है, तो सभी को पालती पोस्ती  है परंतु जब इसकी धारा में एकाएक वृद्धि हो जाती है या यह कह दे कि वह क्रोधित हो जाती है तो अपनी सभी मर्यादाओं और अपने सभी कर्तव्यों को तोड़ती हुई, बिना किसी की परवाह करते हुए समुद्र में या यूं कहें अपनी मंजिल पर पहुंच जाती है | स्त्री अपनी कहानी स्वयं ही कहती है, स्त्री कहती है, जब से इस दुनिया का उदय हुआ, इस दुनिया का आरंभ हुआ, तब से, मुझे सिर्फ यही सिखाया गया कि अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा के साथ करना है. अपनी इच्छा की परवाह नहीं करनी, औरों की इच्छा के लिए हमेशा मेहनत करनी है, लगन से सभी काम को अंजाम देना है, और जो काम असंभव है, उसे भी संभव बनाने के लिए निरंतर प्रयास जारी रखना मेरा कर्तव्य है. बस यही सीखा यही मेरा कर्तव्य था | अनंत जन्मों से, मैं अपने और अपनों के लिए जीवन में स्वाहा होती रही | परंतु अनंत जन्मों से, मैं यह भी देख रही हूं कि मेरे साथ क्या हो रहा है.

भारत के इतिहास के पन्नों में मेरी पूरी कहानी दर्ज हैं | कहते हैं, सतयुग जब प्रारंभ हुआ था, उस प्रारंभ काल से सतयुग के अंतिम समय तक, स्त्री के साथ जो हुआ उसको सिर्फ मैं, एक स्त्री होने के नाते, यही कहना चाहूंगी कि सतयुग में, स्त्री सिर्फ बलिदान के लिए ही बनी थी | स्त्री का जन्म सिर्फ बलिदान के लिए ही हुआ था, आप सभी इसके बारे में कई कहानियां सुन चुके होंगे | स्त्री कहती है कि आपने राजा हरिश्चंद्र जो सत्यवती राजा थे. उनकी कहानी तो आपने सुनी ही होगी, उनके बारे में बताया जाता है कि उन्होंने अपने सत्य के वचन के पालन के लिए अपने और अपने परिवार में बच्चे और पत्नी का भी त्याग कर दिया, दान कर दिया. उस समय भी, मैं कुछ नहीं बोली क्योंकि मुझे मेरा कर्तव्य रोक रहा था, मुझे मेरा धर्म रोक रहा था, मुझे मेरा अस्तित्व रोक रहा था | मुझे मेरे संस्कार रोक रहा था, उस समय भी मेरी किसी ने भी नहीं सुनी,  मेरी स्थिति पर किसी को दया नही आई ओर मे स्त्री धरम मे बलिदान हो गयी | मैंने उसको भी चुपचाप सेहलिया, उसको भी विधि का विधान मानकर यह समझ लिया कि मेरे कर्मों में यही फल लिखा है |

धीरे-धीरे सतयुग बीत गया और फिर त्रेतायुग का दौर प्रारंभ हुआ. त्रेता युग के दौर में भी कुछ खास परिवर्तन नहीं हुए थे, मेरी जिंदगी में | स्त्री कहती है, सतयुग में केवल मैं, मेरे पति और यह प्रकृति ही हमारा एकमात्र संसार था, जो एकदम अकेला था वहां कोई भी नहीं था सिवाय हम तीनों के | त्रेता युग के दौर में, मेरी कुछ मर्यादा थी और उस मर्यादा की चलती मुझे कई बार बहुत सारी परीक्षाएं देनी पड़ी | अपने लिए, अपने आप को साबित करने के लिए, मुझे अपनों के सामने सबूत पेश करने पड़े, जहां मेरे दिल को बहुत ही चोट पहुंची, कि मैं, अपनों के लिए मर रही हूं और वह सब मेरे मरने का इंतजार कर रहे हैं | यहां तक कि मेरा इस्तेमाल किया गया. कहते हैं स्त्री कहती है, कि उस ऊपर वाले ईश्वर ने भी मुझे इस्तेमाल कर अपने लाभ के लिए धर्म का नाम देखकर मर्यादा को बचाने के लिए मेरा बलिदान कर दिया, धर्म की रक्षा करने का नाम देखकर, मुझे इस्तेमाल किया और उसको धर्म की रक्षा का नाम दे दिया |

मैं तो कभी सोचती ही नहीं थी कि कुछ ऐसा भी हो सकता है, वह भी त्रेतायुग के काल में. स्त्री कहती है कि मेरे चुप्पी और मेरे कुछ ना कहने का बहुत ही गलत फायदा उठा लिया, उस काल में लोग मेरा आपहरण कर रहे थे, लोगों ने मुझे खेल समझ रखा था, स्त्री कहती है कि हमें खिलौना समझने का खेल तो त्रेता युग से ही शुरू हो चुका था, दुराचारी अपने विलास भोग विलास के लिए बंदी बना लिया करते थे | स्वतंत्रता क्या होती है यह तो हमें पता ही नहीं था |

फिर धीरे-धीरे युग बदला और हमें हमारी मानसिकता से उभरने का अवसर मिलने लगा | स्त्री कहती है जब द्वापर युग आया वहां हमें कुछ आजादी मिली, हमें प्रेम की आजादी मिली, हमें अपने लिए अपने घर को स्वयं चुनने की आजादी मिली और हमें यह भी पता चला कि सिर्फ यह संसार कर्तव्य को पालन करने के लिए ही नहीं है बल्कि अपने लिए अपनों के लिए, सब का त्याग करना भी पड़े तो भी उचित है. यह सिखाया इस संसार ने हमें इस युग में | सोच की मानसिकता से उबरने के लिए हमें कितने जन्म लेकर और हमें कितने युगों के बीच में से गुजर कर आना पड़ा |

स्त्री कहती है कि यह युग, कलयुग है | यह सिर्फ और सिर्फ हमारा युग है | अर्थात आज से पहले, स्त्री को कुछ बोलने और कुछ करने की आजादी नहीं थी, वह समाज तो सिर्फ पुरुष प्रधान समाज ही था, जो अपने और अपनों के लिए सब कुछ किया करते थे. स्त्री का काम, तो सिर्फ इतना ही था, कि भोजन बनाए, खिलाए, कपड़े साफ करें, बच्चों को पढ़ाई लिखाई, संवारे, बढ़ाएं और अच्छी शिक्षा दें, पतियों की सेवा करें, मां बाप की सेवा करें, बस यही उसका संसार रह गया था | स्त्री कहती है आज के इस आधुनिक युग में, हमें बहुत ही स्वतंत्रता प्राप्त हुई है. इससे हम बहुत ही प्रसन्न हैं, हम अपने लिए, अपने जीवन के लिए, अब स्वयं ही उत्तरदाई हैं, पहले भी स्वयं ही उत्तरदाई थे, बस इस दोनों स्थिति में फर्क इतना ही है, कि पहले हमें कहने, सुनने की कोई आजादी नहीं थी, हमे मर्यादा की बड़ी बड़ी बेड़िया पहना कर रखा जाता था.

परंतु आज के दौर में, हम जो चाहे वह कर सकते हैं, जो चाहे वह बन सकते हैं, जो चाहे वह कह सकते हैं, सुन सकते हैं, और भी बहुत कुछ | आज के युग से पहले कभी भी स्त्री ने अपने अपनी मर्यादा को नहीं तोड़ा था, कहने का अर्थ इतना है, पहले हम साड़ी और पेटीकोट पहनते थे, इसमें एक मर्यादा थी, साड़ी पहनने से स्त्री के कदम जो होते हैं, वह उसके बाहर तक नहीं चल सकती थी, क्योंकि अगर वह ज्यादा लंबा कदम बढ़ाएगी तो वह उलझ की गिर भी सकती थी. यदि हम अपनी मर्यादा से ज्यादा कदम बढ़ाएंगे तो उलझ की गिर भी जाते थे. मर्यादा का सबसे अच्छा उदाहरण है साड़ी का घेर,जो हमारे कदमों को उतनी ही आगे बढ़ने देता था जितना उसका घर हुआ करता था.

आज की इस दौर में हम जो चाहे वह पहन सकते हैं जितना भी चाहे लंबा कदम पढ़ा सकते हैं और चाहे तो हम दौड़ भी सकते हैं इसके लिए हमें किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करना है यह बहुत ही अच्छी बात है जो हमारी स्वतंत्रता को सबसे ज्यादा प्रिय है| स्त्री का स्वभाव ही होता है चंचल परंतु यदि किसी चंचल वस्तु को अगर किसी बोतल में बंद कर दिया जाए तो वह जरूर हो सकता है कि अपनी उड़ने की अपनी घूमने-फिरने की या अपनी चंचलता का थोड़ा सा अंश भूल जाए परंतु बोतल खुल जाने के बाद वह प्रकृति अपने आप स्वयं ही बाहर जाने के लिए और बाहर घूमने के लिए स्वतंत्र हो जाती है .

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