Skip to main content

क्या आप जानते हैं, इस दुनिया का निर्माण क्यों हुआ है ?


क्या आप जानते हैं, इस दुनिया का निर्माण क्यों हुआ है ? अगर, आप यह नहीं जानते तो आप अपनी जिंदगी को देखिए, आपने अपनी जिंदगी में क्या करना चाहा है, आपने ही तो अपनी जिंदगी का निर्माण किया है, और इसी आधार पर इस सृष्टि का निर्माण हुआ है। हमारे हिंदू समाज में, हिंदू धर्मों में यही बताया गया है कि 1 ज्योतिर्लिंग, ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और उसी ने दो महान पुरुषों को जन्म दिया और उन्हें इस सृष्टि का कार्यभार संभालने के लिए नियुक्त किया। 



यह कहानी सृष्टि के जन्म की कहानी, एक पति और पत्नी के-बातचीत से निर्मित हुई है। पति और पत्नी का जिक्र आया है तो मैं इसके बारे में आप सभी को बता दूं, कि दुनिया में पति-पत्नी का ही एक ऐसा रिश्ता होता है जो एक और दूसरे के मिलने से होता है. यह किसी के द्वारा उत्पन्न नहीं होता। माता-पिता का रिश्ता, मां-बेटे का रिश्ता, बाप-बेटे का रिश्ता, भाई-बहन का रिश्ता, मां-बेटी का रिश्ता, बाप-बेटी का रिश्ता, यह रिश्ते ऐसे होते हैं, जो खून के रिश्ते होते हैं, जो जन्म के साथ ही उपहार स्वरुप में हमें प्राप्त होते हैं. परंतु पत्नी और पति का जो रिश्ता होता है, वह समाज के द्वारा एक दूसरे के लिए ही तय किया जाता है। अर्थात दो मन को मिलकर, एक मन का रूप धारण करना होता है। यदि आप चाहें तो पति-पत्नी के रिश्ते के अलावा भी, एक 'ब्रह्मचर्य' नाम का तत्व दिया गया है, उसका पालन कर सकते हैं। परंतु यह दोनों रास्ते जाते केवल एक ही लक्ष्य के पास है, वही है, जो परमात्मा को चाहता है, वही उस लक्ष्य पर पहुंच पाता है। 


ईश्वर ने अपनी धर्मपत्नी के लिए अपने कर्म और धर्म के अनुसार कार्य करते हुए जीवन बिताता रहा परंतु "मन और ईश्वर का रूप एक ही है" अर्थात 'पत्नी' मन, 'पति' आत्मा, का रूप है. पत्नी उसकी ज्योति अर्थात पति एक आत्मा का स्वरूप है और पत्नी एक मन है। पति शरीर का प्रतीक माना जाता है या माना जा सकता है और पत्नी उसकी उसके पत्नी उसके शरीर का मन है जो उसके लिए निर्णय करता है। पत्नी ने अपने पति से कहा कि महादेव देवों के देव महादेव आप तो हर किसी की क्षमता जानते हैं और हर किसी का लक्ष्य भी आपको ही पता है तो आप क्या आप मेरे मनोरंजन के लिए कुछ उपाय कर सकते हैं। प्रभु ने यह कहा मतलब भगवान शिव शंकर ने माता पार्वती को बताया कि चलिए हम आपके मनोरंजन के लिए क्या कर सकते हैं? आप ही बताएं माता पार्वती ने शिव शंकर को कहा कि मैं अपने अपने मन से विचलित हूं और आप मेरे मन के मार्गदर्शन के लिए कोई लीला दिखाइए। भगवान शिव शंकर ने इस समर्थ इस बात को समर्थन करते हुए कहा कि देवी सब कुछ मन का खेल है।

अगर आप मन के बारे में सोचेंगे तो आप कभी अपने आप को नहीं जान पाएंगे आप सिर्फ अपने वर्तमान और अपने आप को जानने की कोशिश है करेंगी तो ही आप अपने मन पर काबू पा सकेंगे परंतु माता के कहने पर उन्होंने इस सृष्टि का निर्माण किया ताकि वह भी अपने और अपने मन के जितने भी परिणाम है वह देख सकें अर्थात वह अपने मन को उच्चतम सोच और नीचे की सोच के बीच का अंतर स्पष्ट कर सकें। हर मनुष्य के जीवन में एक बहुत ही अच्छी स्थिति और एक बहुत ही बुरी स्थिति आती ही आती है परंतु जो व्यक्ति अपने दोनों स्थिति के बीच में समांतर रहता है। अर्थात जैसे मैंने बताया कि अपने आप का ज्ञान प्राप्त कर लेता है वही इस सृष्टि में जीवन लेने और जीवन का जन्म का मजा लेने के लिए ही उत्पन्न हुआ है और इस जीवन का सबसे अच्छा और सबसे बहुत ही बढ़िया जो आनंद है वह और वह सिर्फ ही सिर्फ अपने आप को जानना है। मैंने कहा अपने आप को जानना ही सर्वेक्षक से है और अपने आपको जानने के माध्यम बहुत ही है परंतु हम किस माध्यम को चुनकर अपने आपको जानते हैं यह महत्वपूर्ण है। भगवान शिव शंकर ने एक उच्च माध्यमिक को विश्वास का नाम दिया अर्थात जो व्यक्ति अपनी आस्था और अपने कर्म से अपने माता पिता जो उनके प्रत्यक्ष देवता मौजूद हैं उनके सामने उनका। खून का विशेष तौर पर ध्यान रखें उनका उनसे प्यार करें चाहे वह प्यार वह अपने माता-पिता को ना दिखाना चाहे तब भी वह सर्वेक्षक। अपने माता-पिता को हर व्यक्ति प्यार करता है।

परंतु जिस तरह से युग बदल रहा है लोग अपने माता-पिता के अलावा और दुनिया की मनगढ़ंत बातों में आकर उन्हीं को ही अपना लक्ष्य बनाने पर आमादा हो चुके हैं। ऐसी आदत पड़ चुकी है उनको इसीलिए यह लक्ष्य जानना बहुत ही जरूरी है। माता के कहने पर शिव शंकर भगवान ने इस सृष्टि का निर्माण किया बताया जाता है कि हिंदू धर्म ग्रंथों में की सृष्टि का निर्माण कई बार हुआ है। अर्थात प्रथम बार जब सृष्टि का निर्माण हुआ तो सिर्फ और सिर्फ प्रकृति का निर्माण किया गया प्रकृति में जीव जंतु और भी विशेष तरह की प्रकृति बनाई गई कई तरह की प्रकृति बनाई गई परंतु माता को संतुष्टि नहीं हुई अर्थात माता को वह आनंद नहीं मिल रहा था जिसमें मन का कोई भी हस्तक्षेप हो हस्तक्षेप हो। तब भगवान शिव शंकर के कहने पर ब्रह्मा जी ने मनुष्य जाति का उदय किया मनुष्य जाति को मनुष्य मतलब एक बहुत ही बहुत ही बहुत ही बढ़िया जीव की उत्पत्ति की जिसको हम मनुष्य नाम से जानते हैं जो दो हाथ पैर पर चलो पर चलता है दुआ से काम करता है। दिमाग का उपयोग करता है दिल है दिमाग भावना है संतुष्टि अर्थात जिस तरह के मन का उपयोग जिस प्रकृति में किया जा सकता है। वह सारे गुण विद्यमान है। ईश्वर की कृपा से मानव के अंदर। वर्तमान का ज्ञान और अध्ययन यही कहता है कि सतयुग त्रेता द्वापर और अभी चल रही कलयुग के बीच में सृष्टि का एक बार भी विनाश नहीं हुआ है। अर्थात जब कलयुग खत्म होगा या उसके बाद की जो कहानी चलेगी यह कहानी बहुत ही विशेष है। क्योंकि यह मनुष्य जीवन की कहानी है और इसका कभी भी अंत संभव नहीं है।

युग बदल सकते हैं उसका टाइम बदल सकता है परंतु मनुष्य जाति के मन की कहानी का अंत होना निश्चित है या नहीं इसमें संदेह है। यह एक इस तरह की कहानी है जिसमें मन हमेशा ही उलझा रहता है। आज हम अपने वर्तमान भविष्य वर्तमान को देखकर अपने वर्तमान की दुनिया के बारे में विचार कर सकते हैं कि आज के जीवन में मनुष्य की जो भी प्रकृति है वह हमारे सामने आंखों के हैं। जिस तरह से हमारा दिमाग हमें इंफॉर्मेशन दे देता है। जो भी बाहर दुनिया में हो रहा है वही हम सच्चाई में जानते हैं। परंतु हम अपने अंदर के बारे में कुछ नहीं जानते। इस खुद को जानने का क्या उपाय है? क्या हम इस कुछ को कभी जान सकते हैं? मनुष्य के बारे में बताया जाता है कि यदि वह अपने मन में विश्वास कर क्योंकि विश्वास ही वह जड़ी बूटी है जिससे हर मानसिक और शारीरिक बीमारी का इलाज किया जाना संभव है।

आज मैं आपको एक रहस्य की बात बताने जा रहा हूं। जानते हैं ईश्वर क्या बताना चाहता है इस.  पर.  का संदेश क्या है इस प्रकार अगर आदमी सोचे कि हम किस तरह से यह जान सकते हैं हमें इतना ज्ञान नहीं है तो उसके लिए भगवान ने एक सीधा और सिंपल सा उपाय बताया है। हर व्यक्ति हर रात को सोता है सोने का और जगने का नियम भगवान ने बनाया है उसका भी कोई ना कोई तो परम उद्देश्य या लक्ष्य होगा ताकि मनुष्य अपने उद्देश्य को जान सके। हमारे सोने और जागने की प्रक्रिया के अंदर ही विशेष तत्व का ज्ञान छुपा हुआ है जो भगवान महादेव शिव शंकर ने उसमें निहित किया हुआ है। यदि हम उसको देखें तो हम अवश्य ही यह जान सकते हैं कि सत्य क्या है? भगवान शिव शंकर को देवों का देव महादेव और शिव शंकर भी कहते हैं और उन्हीं का दूसरा अवतार है रूद्र अवतार संघार एक होता है जो भगवान सृष्टि के विनाश के रूप को धारण करते हैं। जब भगवान शिव तरीका भी रामविलास करते हैं तो वह रूद्र रूप और तारीफ करते हैं। वह रौद्र रूप मृत्यु का सूचक होता है। अर्थात जीवन का उदय हुआ है तो जीवन का अंत भी होना ही है। यह निश्चित है इस तथ्य को कोई बदल नहीं सकता।

यही प्रभु का विधान है परंतु जो व्यक्ति अपने जीवन काल में ईश्वर की उपासना करता है। उसको ईश्वर की प्राप्ति होती है और वह मर कर भी अमर हो जाता है। परंतु इस व्यक्ति को ईश्वर की तलाश नहीं होती और वह अपना जीवन सिर्फ अपने उद्देश्य और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही प्रयोग करता है। उसका स्वर्ग और नरक निश्चित है। चलो शिव शंकर भगवान ने बताया है कि मृत्यु है यह शरीर भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है कि यह शरीर नाशवान है आत्मा अमर है पर आत्मा कौन है? उसका साक्षात्कार कैसे हो इस प्रकार का बहुत सारे योग और साधना के उपाय बताए गए हैं। परंतु आज के आधुनिक युग में मानव की वृद्धि और बुद्धि इतनी उच्च और उत्तम नहीं है। उसका मानसिक स्तर भी इतना उच्चतम नहीं है कि वह इस चीज को निश्चित कर सके परंतु एक विधि जो ईश्वर ने हर व्यक्ति के लिए हर स्थिति में बनाई है। ताकि वह उससे उसे सत्य का ज्ञान कर सके कि आत्मा अमर है और शरीर सिर्फ नाशवान है वह दिखाई नहीं देता परंतु हम उसको देखना चाहते हैं। इसलिए वह हमें इस सृष्टि में प्रतीक रूप में दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर यदि हम दर्पण के सामने खड़े हो हैं तो हमें हमारा ही अक्षय दर्पण के अंदर दिखाई देता है और उसे हम सत्य मान लेते हैं। इसी कल्पना के आधार पर इस सृष्टि का निर्माण किया गया है।

सृष्टि के निर्माण के बाद एक दूसरा बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य भगवान श्री कृष्ण के द्वारा किया गया है कि वह कर्म का विधान बनाएं। अर्थात भगवान श्री कृष्ण ने यह कर्म का विधान नहीं बनाया परंतु जिस रचयिता ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की स्थिति में उन्होंने हमारे प्रत्यक्ष भगवान को प्रकट करके उसे जीवन का आगे विस्तार दिखाया है। यही हमें सत्य प्रतीत होता है। परंतु सत्य बिल्कुल विपरीत है जो हम कभी इंसान सोच भी नहीं सकते परंतु हमें यह गुण सोचने का इसीलिए ही दिया गया है कि यदि हम किसी लगन के पीछे अगर विशेष उद्देश्य से लग जाए तो वह कार्य संभव होना ही होना है सर। विश्वास एक ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को भगवान के तुल्य बनाती है या भगवान का भक्त बनने के तुल्य बनाती है और हम अपनी अपनी मानसिकता को बदल कर हम अपने उद्देश्य को भी बदल सकते हैं कि पर जन्म लेने का और जन्म मरण के चक्र से निकलने का क्या क्या मतलब होता है? हम यदि मर जाते हैं तो हमें यह कैसे विश्वास हो कि यह चक्र सच है या झूठ जब हमें कुछ पता ही नहीं तो हम अपनी आंखों देखी बातों को ही सच मानते हैं। परंतु जो मानव नैतिक मूल्य है जो जीवन के लिए बहुत ही उपयोगी मूल्य हैं और वह सिर्फ ही सिर्फ और सिर्फ मानव ही समझ सकता है तो फिर क्यों मानव अपने विश्वास को निर्णय क्यों नहीं बनाता? अपने विश्वास को मजबूत क्यों नहीं बनाता?

मैं सीधा मुद्दे की बात पर आता हूं कि भगवान का साक्षात्कार करने के लिए हमें क्या करना चाहिए हम जब भी कभी शाम को लिखते हैं या रात को जब सोने के लिए जाते हैं तब हम अपनी कमर और अपने शरीर को धरती पर बिल्कुल धरती पर बिल्कुल समतल लेटे और फिर अपने आप को देखने की कोशिश करें। जब हम लेट नहीं जाते हैं अपने बिस्तर पर अपनी धरती पर और बिल्कुल स्टेट लेते हैं जहां पर हम अपने सर के नीचे तकिए का भी इस्तेमाल नहीं करते तो हम अपने आप को कभी नहीं देख सकते। और इस एहसास के बाद कि हम अपने आप को देख ही नहीं सकते तो फिर यह माजरा क्या है इससे आपकी बुद्धि पर एक आघात होगा यदि आप सोच विचार में और ईश्वर में श्रद्धा रखते हैं तो इस विचार को आप दृढ़ता के साथ संकल्प के साथ विचार करेंगे। हमारे देश में जितने भी तपस्वी और मुनि हुए हैं। जिन्होंने ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया है। उनके लिए यह ही संभव हुआ है और हम उन्हीं की संतान हैं तो क्या हम उनके विश्वास के ऊपर अपने अंदर की आत्मा को जागृत अवस्था में देखना नहीं चाहते क्या? यह जो विधि मैंने आपको बताई है आप स्टेटस जमीन पर लेट जाइए और फिर उसके बाद अपने आंखों से अपने शरीर को देखने की कोशिश कीजिए। यदि आप अपने शरीर के किसी भी अंग को नहीं देख पाते तो यह अवस्था ही सजग दा की अवस्था है। आप विचार कर सकते हैं। आप शांत हो सकते हैं और फिर जब शांत होने के बाद आपके मन में छोटे-मोटे विचार आने के बजाय बहुत ही महान विचार आने लग जाए तब समझ जाइए कि ईश्वर आपके साथ है।

सतयुग में बिकता था मां का। सतयुग में बेटा था मां का। खेता में भाई का भाई। भाई था। द्वापर में बना प्रेमी। कलयुग में बीवी। कलयुग में पति बना बीवी का। जिस दिन इस संसार में पति-पत्नी का जो रिश्ता है उसमें भरोसा नहीं रहेगा और यह रिश्ता ही नहीं रहेगा लोग बिना शादीशुदा होते हुए जिंदगी को एंटरटेन के लिए जिएंगे और किसी भी रिश्ते को नहीं मानेंगे। यही एक पति पत्नी का जो रिश्ता है वही एक वजूद रिश्ता इस संसार में रह गया है। बाकी बस जिस दिन यह रिश्ता खत्म हो जाएगा। खोल कलयुग की शुरुआत अपने चरम पर शुरू हो जाएगी उस उस समय कुछ ही व्यक्ति ही ऐसे होंगे जो जिस रिश्ते में विश्वास कर सकेंगे और उन्हीं के यहां से जन्म होगा कली भगवान का। जैसे-जैसे धर्म खत्म होते चलाया गया है। आप शुरू से देखिए सतयुग में चार पैर थे त्रेता में 32 परमिट दो अर्थात मां बेटे। हां बेटा भाई-बहन ठीक है बाबा मां बेटा भाई बहन मां बेटा भाई या मां बेटा बहन। बाप बेटा। यह कैसा रिश्ता है? जिसमें एक दूसरे से झूठ नोट खत्म होता चला गया छूट खत्म होता चला गया अर्थात सत्य खत्म होता चला गया झूठ ने अपनी चाल है लाली और धीरे-धीरे आदमी को खुश किया है। प्रतिदिन हम सभी कुछ ना कुछ अपलोड बोलती रहते हैं और आदत पड़ गई है हर रिश्ते में झूठ बोलते रहते हैं। यूसी धर्म के कमी की धर्म की कमी की रास्ता निकलता धर्म की कमी का रास्ता निकलता है। जिस धर्म को भगवान बचाना जाते हैं वहीं धीरे-धीरे खत्म होता चला जा रहा है। इसीलिए वही व्यक्ति जो सदैव सत्य बोलता है और इस पवित्र रिश्ते में विश्वास करता है ईश्वर में विश्वास करता है वही वही वही बात नहीं हो सकता है। क्योंकि अमीर आदमी हमेशा आप बेकार में रहता है या कभी ना कभी उसे बुखार आता ही रहता है या नहीं आता।

अजीब दस्तूर है जिंदगी का एक एक तरफ जीने के लिए उत्साह देती है और दूसरी ही तरफ उस उत्साह के साथ कुछ डर भी देती है जिस दर से हमारी जिंदगी कंट्रोल होती रहे परंतु जिस महत्वपूर्ण बिंदु कि हम बात कर रहे हैं वह केवल और केवल एक लक्ष्य है लक्ष्य कोई छोटा-मोटा शब्द नहीं है यह जिंदगी को बनाने और बिगाड़ने वाला लक्ष्य एक शब्द है लक्ष्य कोई छोटा-मोटा शब्द नहीं है जिससे जिंदगी में कोई फर्क न पड़े यह यह तो एक महान शब्द है जिससे लोगों ने अपने इतिहास रचे हैं परंतु दुनिया का दस्तूर मैंने पहले ही बताया बहुत ही अलग है वह किसी भी व्यक्ति को अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने के लिए हमेशा ही रोकती रहती है रूकती रहती है रोकती रहती है लोगों के पास भी उनके आसपास का ज्ञान उनके माता-पिता का दिया हुआ ज्ञान और उनके गुरुओं का दिया हुआ ज्ञान ही होता है जो उनका मार्गदर्शन करता है परंतु शेर का शिकार और लक्ष्य का भेदन सिर्फ और सिर्फ धैर्य के साथ किया जा सकता है परंतु आज के वर्तमान युग में धैर्य नाम की वस्तुएं तेरे नाम की जो यह क्रिया है जो धरे नाम का जो प्राणी है वह विलुप्त हो गया है आज के समय में मनुष्य को जरा सा भी धैर्य नहीं है वह अपने कार्य का प्रतिफल तुरंत पाना चाहता है और यह प्रकृति के नियम के बिल्कुल विपरीत है जिस प्रकार किसी भी बीज को पौधा पौधा बनने में और उसके बाद पेड़ बनने में समय लगता है और उसी प्रकार उसके अंदर फल बीज फूल पत्तियां आने में समय लगता है उसी प्रकार जीवन का भी निरंतर एक क्रिया वयम है जो हमेशा ही अपने नियम के अनुसार ही चलता है समय के अनुसार ही सारे कार्य और समय के अनुसार ही सारे इच्छाओं की पूर्ति होती है परंतु हर किसी में समय अवश्य लगता है |

दुनिया का खेल बहुत ही निराला होता है हर पल में कोई ना कोई जन्म लेता है और किसी ना किसी की मृत्यु होती ही रहती है जीव जंतु पशु पक्षी कोई भी इससे अछूता नहीं रहता जिंदगी अपने आप को बहुत ही होशियार समझती है परंतु वास्तव में वह होशियार नहीं होती बल्कि मौत जिंदगी से ज्यादा होशियार होती है जिस तरह से एक हिरन अपने बच एक हिरण जिसके पीछे एक शेर पढ़ा हुआ है जो उसको मार कर उसका मांस खाने का इच्छुक है बहुत ही क्रियाशीलता के साथ उसका ध्यान और उसका रफ्तार दोनों को माफ कर उसके पीछे दौड़ता है और एक न एक दिन वह अपने लक्ष्य तक प्राप्त कर लेता है दूसरी तरफ हिरन जो अपनी जान बचाने के लिए पूरी कोशिश करता है भरसक प्रयास करता है और इतना प्रयास करता है कि वह यह नहीं जानता कि उसकी मौत उसकी जिंदगी से ज्यादा समझदार है पर जिंदगी की तो समझदारी मौत के आगे नहीं चलती मेरे भाई आखिरकार हिरण को शिकार हिरण का शिकार हो ही जाता है और शेर अपने लक्ष्य में कामयाब हो जाता है इसी प्रकार मनुष्य भी एक प्रकार का शेर ही तो है जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही इस दुनिया में अवतरित होता ही रहता है और जब जो व्यक्ति शेर बन जाता है उसका ही लक्ष्य प्राप्त होता है नहीं तो ज्यादातर मनुष्यों का तो हिरण जैसे ही व्यवहार होता है अर्थात वह हिरण के तरह ही अपनी जिंदगी में अपने जीवन को बचाने के लिए भरसक प्रयास करता रहता है और वह यह नहीं जानता कि मौत निश्चित है अजीब दस्तूर है जिंदगी का एक एक तरफ जीने के लिए उत्साह देती है और दूसरी ही तरफ उस उत्साह के साथ कुछ डर भी देती है जिस दर से हमारी जिंदगी कंट्रोल होती रहे परंतु जिस महत्वपूर्ण बिंदु कि हम बात कर रहे हैं वह केवल और केवल एक लक्ष्य है लक्ष्य कोई छोटा-मोटा शब्द नहीं है |

Thanks For Reading

Comments

Popular posts from this blog

आध्यात्मिक जीवन का सार spritual truth of world

आध्यात्मिक जीवन का सार spritual truth of world  दोस्तो आपको मेरा प्यार भरा नमस्कार    Sprital hindi Me  आपका स्वागत हे, इसे भी पढ़े आस्था OR विश्वास का देश india, India is a country of faith आध्यात्मिक जीवन का सार यही हे की , ( में) वो है ,  जो देखता है ,  तथा में अपने सामने होने वाली घटनाओं ,  विचारों और भावनाओं के प्रति जागरूक हो अर्थात इस जीव जगत में सभी जगह भगवान श्री विष्णु ही समाये हुए है और वही हर जीव में से आत्मा नामक तत्त्व की सहायता से सब कुछ भली भाँति देखता रहता हे हमारी और सभी जीव-निर्जीव ,  तत्व-पदार्थ हर किसी की एक दृष्टि होती हे , आँख होती हे नज़्ज़ारिया अपना-अपना होता हे. महामुनि नारद जी   भक्तो में परम भक्त और ज्ञानी में परम ज्ञानी परम प्रिय भक्तो के उच्चतर श्रेढ़ी में सुशोभित है भगवान श्री हरी का ही नाम सुमिरते रहते हे और सभी भक्तो को सदा यही कहते रहते है श्रीमान नारायण नारायण नारायण   और भगवान की बनाई इस दुनिया का दर्शन करते और भगवान की महिमा और शक्ति की ज्योति से अपने मन की ज्योति को अनुभव कर...

🌷🌷 भक्त_की_परीक्षा🌷🌷

 #भक्त_की_परीक्षा 🌷🌷🌷 .🌹🙏शुभ 🙏🌹 एक गाँव के बाहरी हिस्से में एक वृद्ध साधु बाबा छोटी से कुटिया बना कर रहते थे।  वह ठाकुर जी के परम भक्त थे। स्वभाव बहुत ही शान्त और सरल। दिन-रात बस एक ही कार्य था, बस ठाकुर जी के ध्यान-भजन में खोये रहना। ना खाने की चिंता ना पीने की, चिंता रहती थी तो बस एक कि ठाकुर जी की सेवा कमी ना रह जाए। भोर से पूर्व ही जाग जाते, स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होते ही लग जाते ठाकुर जी की सेवा में।  .उनको स्नान कराते, धुले वस्त्र पहनाते, चंदन से तिलक करते, पुष्पों की माला पहनाते फिर उनका पूजन भजन आदि करते जंगल से लाये गए फलों से ठाकुर जी को भोग लगाते। बिलकुल वैरागी थे, किसी से विशेष कुछ लेना देना नहीं था। फक्कड़ थे किन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे। यदि कोई कुछ दे गया तो स्वीकार कर लिया नहीं तो राधे-राधे।फक्कड़ होने पर भी एक विशेष गुण उनमे समाहित था, उनके द्वार पर यदि कोई भूखा व्यक्ति आ जाए तो वह उसको बिना कुछ खिलाए नहीं जाने देते थे। कुछ नहीं होता था तो जंगल से फल लाकर ही दे देते थे किन्तु कभी किसी को भूखा नहीं जाने दिया। यही स्थिति ठाकुर जी के प्...

sprituality of every human being

sprituality of every human being I am a person who has ever seen me, I have seen him, I have seen him in a lot of things, and I have a lot to say about the value of his life, and I am convinced that he is going to be complete Part of the world, she loves her very much and she has to give it to her. I can see that person's name as his name, and he was able to show his love for him, because he was a teacher, he had a dream for himself, he is a young man, he is very much Only Apna-Apne got it bitter The essence of spiritual life is that he is the one who is aware of the events, thoughts and feelings that arise in front of him. That is, in this world of life, Lord Vishnu is worshiped everywhere, and likewise, every creature sees everything well with the help of a principle called Spirit. The same person keeps looking at everything with the help of a principle called spirit. Ours and all the living beings, the elements, the vision of everyone, have their own eyes. Lord Hari see...