शिव तत्व क्या है,
का एक और भी गहरा राज है शिव तत्व का अर्थ है भलाई सेवा लोगों की रक्षा करना ईश्वर के बनाए स्वरूप की रक्षा करना उसके बनाए धर्म की सत्य की रक्षा करना उसके बनाए नीति नियम की रक्षा करना नियम और प्रकृति की देखभाल करना यही उसका परम तत्व का ज्ञान है आपने तो सुना ही होगा कि भगवान शिव शंकर के दो पुत्र हैं प्रथम पुत्र हैं उनके सबसे बड़े पुत्र उनका नाम भगवान कार्तिकेय महाराज है जिनको हम मुरगन स्वामी भी कहते हैं जिनको हम एक बार भी देवता के नाम से जानते हैं जो ब्रह्मचारी योद्धा है| दूसरे पुत्र हैं भगवान श्री गणेश पुत्र गणेश पुत्र गणेश जी बहुत ही बहुत ही बहुत ही गजब के बुद्धिमान और बहुत ही गजब के अज्ञानी मालूम पड़ते हैं या है, भगवान शिव शंकर के सेकंड दूसरे पुत्र भगवान गणेश हैं जिनको जीने देवी देवताओं को जिनको हम धन वैभव सौभाग्य विद्या का देवता मानते हैं भगवान इस्त्री करने सेकेंड पुत्र हैं एक सच्चे और भी छुपा हुआ है सत्य एक और भी छुपा हुआ है है माना जाता है कि महान भगवान गणेश माता पार्वती की द्वारा बनाए गए पुत्र हैं और भगवान शिव शंकर के द्वारा बनाया गया पुत्र है मुरगन स्वामी कार्तिकेय महाराज इन दोनों के जीवन का जन्म केवल और केवल शक्ति के द्वारा ही हुआ है उनका शारीरिक रूप से जन्म नहीं हुआ है यह विचित्र प्रकार से जन्म हुआ है,
कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है ईश्वर ने अपने पुत्रों का जन्म केवल तब के माध्यम से किया है और तब से बड़ा होता है ज्ञान इसी प्रकार से माता पार्वती ने महाराज भरे भगवान गणेश को प्रकट किया जो उन्होंने मिट्टी के ढेले से बनाकर उसमें अपनी शक्ति का प्रवाह किया और इसी प्रकार भगवान शिव ने भी गर्व से भगवान शिव ने भी कार्तिकेय महाराज को अपने वीर्य से उत्पन्न किया है जो स्त्री के गर्भ में नहीं गया इसीलिए उन्होंने तपस्वी का रूप धारण करके मुरगन स्वामी रूप धारण करके अपने दक्षिण में ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं और वही भगवान श्री गणेश का जन्म और जन्म को सांसारिक ता के बंधन में बांध कर उनका विवाह वृद्धि और सिद्धि माता के साथ कर दिया गया जाता है भगवान श्री गणेश हमेशा माता पिता के ही साथ रहते हैं परंतु भगवान मुरगन स्वामी दक्षिण में एक तपस्वी का रूप धारण करके लोगों के धर्म की रक्षा करने के लिए रक्षा करते रहते हैं किसी से माना जाता है कि दोनों भाई अलग-अलग रहते हैं और इसका भी एक मुख्य कारण है आप जानते ही होंगे कि जब भगवान नारायण के भगवान नारायण के परम भक्त नारद मुनि ने दोनों भाइयों के बीच में एक बात रखी कि कौन पृथ्वी के तीन चक्कर लगाकर जल्दी लौट कर आ सकता है तो दोनों देवताओं ने अलग अलग रास्ता चुना भगवान कार्तिकेय महाराज सबसे पहले अपने मोर के वाहन पर बैठकर मोर के वाहन पर बैठकर पृथ्वी के चक्कर लगाने के लिए निकल जाते हैं और वही कहते हैं कि वह तब के देवता हैं इसलिए वह मेहनत के साथ काम को करना चाहते हैं और करते भी हैं, कोई भगवान श्री गणेश माता पिता को ही भगवान मानकर उनके प्रदर्शन करना शुरू कर देते हैं और इस भावना को भगवान और मां उनको स्वीकार भी करते हैं कि हां यह सही बात है अब इसी प्रकार से दोनों भाई अलग अलग हो गए तने का तात्पर्य है कि तब और ज्ञान एक साथ अभी नहीं रह सकता जैसे जैसे युग बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे तत्वज्ञान एक साथ नहीं रह सकता बस यही सी शिप तत्व की शुरुआत होती है शिव तत्व का मतलब है तब और ज्ञान दोनों साथ-साथ चलना दोनों का साथ साथ जीवित रहना साथ साथ रहना खाना-पीना खेलना कूदना और सब कुछ आपने यही सुना होगा कि भगवान शिव शंकर हमेशा अपने आपको सेवक कहते हैं सेवक का मतलब होता है जो अपने भगवान की सेवा करें भगवान कौन है उनके उनके भगवान कौन कौन हैं हम नाम बिना देते हैं और उसके बारे में भी बताते हैं कि वह फिजिकल रूप से आपको कहां दिखाई देते हैं,
जैसे सीताराम राधेश्याम जी सीताराम का मतलब क्या है सीता अर्थात पृथ्वी अर्थात प्रकृति अर्थात प्रकृति राम का मतलब क्या है राम का मतलब अर्थात ईश्वर अर्थात मानव अर्थात पुरुष अर्थात अर्थात पुरुष प्रकृति और पुरुष की सेवा करना ही भगवान शिव शंकर का मूल उद्देश्य है भगवान शिव शंकर ने भी अनेकों रूप धारण किए हैं इस पृथ्वी पर और विश्व का सीताराम की बात चल रही है सीताराम में भी उन्होंने अपने रूद्र अवतार हनुमान के रूप में जन्म लिया और इस धरती का कल्याण करते रहते हैं, आज के संसार में साधना और ज्ञान हासिल क्यों नहीं होता है इसका भी कारण है क्योंकि हम अपने सामने वाली दुनिया में इतने खो गए हैं दिखने वाले दुनिया में इतने खो गए हैं कि हमें हमारे बारे में ही ज्ञान नहीं है कि हमारे साथ क्या हो रहा है बस हमें बाहरी चीजें महसूस होती हैं आंतरिक की जो पर हम जान नहीं देते और आंतरिक चीजें ही उस माता का ज्ञान प्राप्त करवाती हैं जो हमें प्राप्त होना चाहिए हमारे परम उद्देश्य के लिए और वह है शिव तत्व का ज्ञान और शिव तत्व का ज्ञान बहुत ही अनमोल होता है जिसका कोई भी मकान नहीं कर सकता और ना आज तक कर पाया है क्योंकि जो कर पाया है उसने महसूस नहीं किया और जिसने महसूस किया उसको याद नहीं रहा और उसको तरीके के बारे में पता नहीं था इसीलिए वह बता नहीं पाया कि क्या है शिव तत्व पृथ्वी पर जन्म लेने के लिए प्रकृति और पुरुष के रूप में ही तो सभी चीजों की शुरुआत हुई प्रकृति और पुरुष प्रकृति की रक्षा करने के लिए ही पुरुष का जन्म हुआ है पुरुष का जन्म प्रकृति का उपयोग करने के लिए नहीं हुआ है वह उसकी रक्षा करने के लिए उसको वृद्धि प्रदान करने के लिए ही हुआ है बस यही से संसार और यहीं से संसार के उस पार का रास्ता शुरू होता है जो इसको जान लेता है वह संसार के उस पार निकल जाता है और जो इस संसार के बारे में यदि अपने सामने होने वाली घटनाओं से जानने का प्रयास करता है तो वह कहीं खो जाता है यह दोनों मार्ग बहुत ही एक जैसी प्रतीत होते हैं और लगभग एक जैसे हैं भी परंतु सिर्फ एक भावना का जो ज्ञान है उसी के रास्ते में ही सब कुछ पड़ता है और इस भावना के रास्ते का चुनाव सिर्फ और सिर्फ मनुष्य करता है और मनुष्य का की जैसी भावना होती है वैसे ही उसकी दुनिया होती चली जाती है यह बात तो आप सभी जानते ही हैं बस यही शिव तत्व की शुरुआत से और शुरुआत तक का सफर तय करने के बीच में ही है क्योंकि शिव तत्व के बारे में बताने के लिए ज्ञान कम पड़ सकता है यह मेरा मानना है मनुष्य इच्छाएं जितनी करता जाता है उतने ही ज्यादा आवश्यक तत्व से दूर होता जाता है जितनी इच्छाएं कम होती है उतना ही शतक के करीब वह महसूस करता है सिर तत्व का यही कहना है अब शिव तत्व के बारे में अगर बताया जाए तो फिर शिव तत्व एक बहुत ही अंतरिक्ष खोज है,
साधारण मनुष्य में और असाधारण मनुष्य में फर्क होता है साधारण मनुष्य की इच्छाएं उसकी इच्छाओं उठाएं बहुत ही तीव्र होती हैं परंतु असाधारण मनुष्य की इच्छाएं तो नहीं होती वह बहुत ही आराम से हर एक की की इच्छा करता है परंतु आज का मनुष्य तो इच्छाओं का भंडार लिए घूमता है हमेशा रिक्शा उसके दिमाग में घूमती रहती है चलती ही रहती है और उसके शरीर से हाव-भाव भी इच्छाओं के ही व्यक्त होते हैं इस पर वह फिर से तत्व का ज्ञान कैसे प्राप्त कर पाएगा यही समस्या है यही तो रास्ता है परंतु यही समस्या और रास्ते के बीच में ही इंसान मृत कर रह जाता है उलझ कर रह जाता है वह सिर्फ वास्तविकता को ही देख पाता है उसके पीछे छुपे हुए वास्ते वास्ते तत्व को नहीं जान पाता वास्तविकता यह है कि मनुष्य ने जन्म लिया है तो अपने माता माता पिता की सेवा करें अपने परिवार का कल्याण के लिए मेहनत करें और उसके समृद्धि के लिए योजना बनाएं उसके आगे आने वाले जीवन के लिए रास्ता तैयार करें रास्ता तैयार करते हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए ज्ञान और समृद्धि के रास्तों की खोज में ही विलुप्त हो जाते हैं खो जाते हैं मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं अपने लक्ष्य की मेल लक्ष्य की तरफ ध्यान नहीं दे पाते और यहीं से विवाह नहीं चाहिए उनका श्री धीरे विलुप्त होना शुरू हो गया आज की दुनिया में सिर्फ तपस्या का ही मार्ग दिखाई देता है तपस्या अर्थात मेहनत अर्थात अपने दम पर कुछ करना बस यही से इस दुनिया में परिवर्तन शुरू हो गया है पहले की दुनिया में औरतों की दुनिया में बहुत फर्क है पहले मानवता रहती थी परंतु अब मानवता के साथ-साथ धानोता भी रहती है सही के साथ गलत भी रहता है और अच्छे के साथ बुरा भी रहता है खराब के साथ सही रहता है.
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