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हिंदू होना एक महान गोरव हे अपने आप मे.

कब जागेगा हिंदू
ॐ नमः शिवाय

अपनी परंपरा को भूलता जा रहा हे ओर हमेशा हाथ जोड़ने की कला के पीछे अपनी कमज़ोरी छिपा रहा हे, कब तक सोता ओर रोता रहेगा. हज़ारो सालो से गुलाम की तरह जी रहा हे अपने देश मे, अपने ओर अपनो की राह को छोड़कर दूसरो की राह क्यो अपना रहा हे हिंदू, अपनी सभ्यता को छोड़कर, संस्कृति को छोड़कर ओरो की #CULTURE क्यो अपना रहा हे हिंदु.
अपने पंचांग के बारे मे जनता नही ओर #WHATUP पर #HAPPY BIRTHDAY ओर #NEW YEAR मना रहा हे हिंदू, हिंदू सभ्यता सबसे पुरानी हे, पर फिर भी अपनी आस्था को नही लगा रहा हे हिंदू, गुलाम हो गया हे अपने आदत से क्या इसलिए जी चुरा रहा हे हिंदू.
इस पोस्ट को इतना SHARE करो की हर हिंदू को अपने वेद ओर पुराण की याद इस कदर आ जाए जेसे रोते हुए बच्चे को अपनी माँ की याद आ जाती हे. अगर हिंदू हो तो ही SHARE कर सकोगे.
हमारा मन, हमारा मन विचारों का संग्रह किया करता है वह हमारे दिमाग के साथ एक खेलता खेलता है वह अनगिनत विचारों को हमारे चारों तरफ के वातावरण से एकत्रित करके हमारे जीवन से, हमारे दिमाग में इस तरह की पर्तिकिर्या करने की क्रिया में इस प्रकार व्यवस्थित है, जैसे लाखों दिन में, से, यह इसी काम को करता रहा है. हमारा दिमाग एक तरह की स्वचालित मशीन का कार्य करती है वह हमारे रोज के कामों को एक सही एवं सिद्धांत एवं अनुपात में अपने आप ही करता रहा है जिससे सबसे जरूरी काम है नींद का आना एवं आंखों का खुलना. दिमाग एक शक्तिशाली कंप्यूटर है जो किसी भी कार्य को बिना किसी रूकावट के कर सकता है चाहे वह कार्य कितना भी आ-संभव क्यों ना हो. हम अपने मन के द्वारा हर किसी कार्य या संभावना को पूर्ण करने में सक्षम हैं परंतु इसके लिए हमें अपने मन को यह सिखाना जरूरी है कि कौन सा कार्य हमारे लिए जरूरी है और कौन सा कार्य हम नहीं करना चाहते, 
मानव मन एवं मस्तिष्क एक अद्भुत कलाकार है ऐसे में यदि हम इसका प्रयोग जान सकते हैं तो यह हमारे सामने अद्भुत तरह से सफलता के सारे दरवाजे खोल देता है यह हमें हमारे भीतर परम तत्व से प्रकृति से और हमारे विश्वास से इस कदर जोड़ता है कि हम कब सफलता प्राप्त कर लेते हैं हमें पता ही नहीं चलता और हम जो भी हमारा उद्देश्य है इस धरती पर आने का वह भी, यह दोनों कलाकार मन एवं मस्तिष्क स्वयं बता देते हैं कि उद्देश्य क्या है मानव मस्तिष्क सब कुछ संभव करके वास्तविक प्रगति प्रदान करता है और उसमें प्राण प्रदान करता है हम जो भी अपने आसपास होता हुआ देखते हैं वह सब कुछ हमारी अपनी मन और मस्तिष्क में भरे विचारों का ही परिणाम होता है आप और हम जिस व्यवस्था, स्थिति और रास्ते पर हैं वह भी बीते विचारों का साक्षात अनुभव है आज मैं अपने आप को देख कर बस वही प्रश्न दोहराता हूं, जो आज से पहले, अपने 14 साल में पूछा करता था, कि मेरा धरती पर आने का कोई विशेष उद्देश्य क्या है, मैंने अपने जीवन के 31 साल में अपने उद्देश्य का पता लगाने में बिता दिए और रोजी-रोटी को पक्का इंतजाम करने में लगा रहा मैं जानता हूं इस साल में जो भी चाहता हूं वह प्राप्त कर सकता हूं क्योंकि अब यह मन एवं मस्तिष्क रूपी कलाकार को अपनी इच्छा से किस तरह कल्याणकारी बनाना है जानता हूं जिस बात पर मैं विश्वास करता हूं वह सत्य हो रही है,  
यह एक अद्भुद अनुभव हे...............................................................
एक व्यक्ति था उसका नाम मनीष था, उसका परिवार भरा पूरा है, उसका मन इतना परेशान था कि वह यह नहीं समझ पाया कि जीवन में, हमारा क्या धर्म है, क्या कर्म है, और क्या लक्ष्य है, क्या उद्देश्य है, सारा जीवन वह अपने आसपास होने वाली घटनाओं को देखने और सुनने में ही बड़ा हुआ, खेला, खाया, सीखा परन्तु अपने जीवन को परम शांति ना पाया. आज के युग में, क्या यह मान लेना, कि जीवन भर अपने और अपनों की इच्छाओं की पूर्ति करना ही हमारा परम लक्ष्य है, या फिर, वह अद्भुत ऊर्जा विद्यमान है इस परंपरागत जगत में, परम जागृत में, जो इंसान को हर कार्य करने में मदद करती है, उसकी रक्षा करती है, उसके जीवन संचालन में उसकी मदद करती है, वह आदमी संसार की थोपी हुई मान्यताओं और सुझावों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था, वह एक अलग दुनिया अलग जीवन चाहता था. इसी सबके बीच, वह आस्था के मानसिक संसार की ओर मुड़ चला, उसका झुकाव अपने धर्म और आध्यात्मिकता की तरफ बढ़ने लगा और वह व्यक्ति वेद, पुराण, एवं और भी प्रेरक पुस्तकें पढ़ने लगे लगा और उसके द्वारा किया के अध्ययन बहुत ही अद्भुत जान पड़ा उसे, महसूस ही नहीं हुआ जीवन में की अभी तक जो उसने जीवन की समझ नहीं पाई थी या अभी तक का जैसा जीवन था वह तो केवल एक पहला पायदान मात्र था मंजिल तो कहीं दूर इंतजार कर रही है
वह व्यक्ति मानने लगा कि इसके द्वारा पढ़े गए वेदों और पुराणों की वाणी सत्य है, वेद और पुराणों की यही बात उसे समझ में आई- (जीवन में वह चाहो, जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष ना रहे,)
आप तो जानते ही हैं और पहले भी मैंने कहा था, सभी मनोकामनाएं पूरी नहीं होती और जिसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हुई भी है, उसके जीवन को अच्छाई के साथ ही जीना सीखना पड़ा होगा तभी वह उस मकान तक पहुंचा है, 
एक दिन मनीष घर पर बैठा था अचानक वह हरिद्वार जाने के लिए तैयार हो गया वह देश के सभी तीर्थों के बारे में पढ़ ही रहा था इसलिए जिज्ञासा वश जान, वह जानना चाहता था वहां की महत्ता, वह व्यक्ति अपने तीर्थयात्रा पर निकल चला बहुत सारे तीर्थों का पुण्य उसने इस जीवन काल में अर्जित कर लिया परंतु वह अभी भी अपनी इस जीवन के परम लक्ष्य को नहीं पा सका था उसका मानना है कि यदि वेदों और पुराणों ने कहा है कि सच्ची आस्था और विश्वास से उस महान ऊर्जा को खोजो तो वह तुम्हें मिल ही जाती है, समय कितना लगता है, और कहीं ना कहीं यह बात उसके दिलो-दिमाग में बैठ गई थी कि वह अपना परम लक्ष्य पा सकता है इसीलिए वह पुनः अपनी इस यात्रा में जारी रहा, उस व्यक्ति का परम लक्ष्य है उस परम, पावन, मधुर और सशक्त ऊर्जा को जान सके, उसका दर्शन कर सके, अपने जीवन में शिक्षा प्राप्त कर सके, इस संसार के प्रति क्या दायित्व देकर भेजा गया है और उसको कैसे पूर्ण किया जाना है, क्योंकि जिंदगी और समय कभी किसी के लिए रुकता नहीं, हमें ही रुकना और रुक कर सोचना ही पड़ता है उस व्यक्ति को यह पता चला कि उसे परम को प्राप्त करने का कोई माध्यम भी है वह माध्यम है प्रभु राम को पाना और राम को पाना है तो उनके परम प्रिय भक्त हनुमान को ढूंढना होता है इस आधुनिक युग में जहां अपने और अपनों के लिए समय नहीं निकाला जा सकता, वहां हनुमान को ढूंढने के लिए समय कैसे निकलेगा, इसीलिए किसी योग्य गुरु का होना बहुत ही आवश्यक है.
यह जो हमारे सामने हर पल एक वीडियो की तरह एक टेलीविजन की तरह कुछ ना कुछ नया आंखों के सामने आता ही रहता है कानो में जाता ही रहता है और उन्हें देखने में, सुनने में, हम इतना व्यस्त हो जाते हैं कि सच में वही दुनिया हमें अपनी दुनिया जान पड़ती है, सत्य जान पड़ती है, जब हम सब हो रही घटनाओं को सच मानने पर मजबूर हो जाते हैं फिर यह विचार, हमारी संपूर्ण दुनिया को ही बदल देता है यह पूरा संसार हमें वैसा ही दिखाई देने लगता है जैसा हमारी निजी जिंदगीया होती हैं या यूं कहें जैसा संसार हमें दिखाई पड़ता है हमारी निजी जिंदगी भी उसी तरह ढलती चली जाती है फिर हम किस तरह से अपने जीवन में सुख शांति करुणा प्रसन्नता दया भावना उदारता को हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं और जब हम इन सभी बहुमूल्य संभावनाओं को प्राप्त ही नहीं कर सकते तो फिर यह मान लेना, कि यह जीवन की सबसे बड़ी हार है और हार केवल सिर्फ इसलिए है, कि यह मनुष्य की एक गंदी आदत है जिसके प्रति वह इतना वशीभूत हो चुका है कि वह अपनी इस आदत पर ध्यान ही नहीं रख पाता और वह अपनी इस आदत में इस तरह उलझ कर रह जाता है और उसे इस तरह की आदत पड़ जाती है कि वह उसे कभी सुधार ही नहीं सकता. जब गंदी आदत से एक व्यक्ति पीड़ित हो तो दुख होता है परंतु जब इस गंदी आदत से पूरा संसार पीड़ित हो तब घोर दुख होता है, अपार दुख होता है. यह जो संसार है इसमें आप ही फैसला कीजिए क्या हम अपने आप के प्रति विश्वास पात्र हैं, क्या हम ईमानदार हैं, हम हम समझदार हैं, हम स्वस्थ हैं, हम जागृत हैं.
हम सभी, अपनी परिस्थितियों के अनुसार ही कार्य कर रहे हैं, चाहे हम जानते ही क्यों ना हो, कि यह गलत है पर फिर भी सही क्या है और उसे कैसे करना चाहिए, हम यह भी जानते हैं कि यहां क्या होना चाहिए तो, यह कि दुनिया है, दुनियादारी में कार्य तो करना ही पड़ेगा, अपने नाम पर दाग न लग जाए, फिर किया फिर नहीं कर पाया तो फिर लोग क्या सोचेंगे आप चाहे जो भी कहे परंतु आप स्वयं दिल से जानते हैं कि आप पहले प्रश्न के प्रति उत्तरदाई है क्या, दुनिया की, इस ब्रह्मांड की कल्पना ही ऐसी है जो निरंतर बदलती जाती है इसे समझने के लिए पहला प्रश्न को समझना अति महत्वपूर्ण है. यह दुनिया, विचारों की दुनिया है, भौतिक एवं मानसिक विचार, जिस तरह के विचार, जिस तरह के विचारों का दबाव होता है, उसी तरह का काम उसी तरह का समय चलता है दोस्तों उसी तरह का जीवन चलता है दोस्तों यह विचारों का समय चार प्रकार का होता है यह समझने के लिए हमें एक कहानी सुननी होगी आइए हम उसे आपको कहानी के माध्यम से समझाते हैं. 
एक परिवार था उस परिवार में माता-पिता भाई-बहन पति पत्नी चाचा भतीजा भतीजी बुआ फूफा पति भतीजी भतीजा सास ससुर देवर भाभी नंद भौजाई रहते थे, उस परिवार में माता-पिता भाई-बहन पति पत्नी चाचा भतीजा भतीजी बुआ भतीजी भतीजा सास ससुर देवर भाभी नंद भौजाई, प्रेम से रहा करते थे, वह सभी बड़े ही प्रेम भाव से सुमति और आदर भाव से रहते थे. हर व्यक्ति हर तरह की हेल्प किया करता था. आपस में किसी से किसी की कोई बात छुपी नहीं थी सब खुले विचारों के व्यक्ति हैं अब आप ही सोचिए कि यहां एक दूसरे के लिए हीन भावना जलन अविश्वास लुक्का चुप्पी हर कार्य में आ सकती है भला, इस तरह आप अपने पहले प्रश्न का उत्तर जान जाओगे. 

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